भारत की न्यायपालिका न्याय, करुणा और संवैधानिक मूल्यों की वैश्विक प्रतीक रही है। इसी संदर्भ में हाल ही में कई पूर्व न्यायाधीशों, वरिष्ठ वकीलों और शिक्षाविदों द्वारा माननीय मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत को लिखे गए खुले पत्र ने एक महत्वपूर्ण .......
भारत की न्यायपालिका न्याय, करुणा और संवैधानिक मूल्यों की वैश्विक प्रतीक रही है। इसी संदर्भ में हाल ही में कई पूर्व न्यायाधीशों, वरिष्ठ वकीलों और शिक्षाविदों द्वारा माननीय मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत को लिखे गए खुले पत्र ने एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है। इस पत्र में रोहिंग्या समुदाय को घुसपैठिया बताने वाली टिप्पणी पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।
मैं, Dr. Anthony Raju,
Advocate, Supreme Court of India,
International Human Rights Defender और विश्वभर में सम्मानित मानवाधिकार अधिवक्ता,
इस विषय पर अपना स्पष्ट और दृढ़ मत रखना आवश्यक समझता हूँ।
मानवता को किसी लेबल की नहीं, न्याय और गरिमा की आवश्यकता होती है। किसी भी उत्पीड़ित समुदाय को घुसपैठिया कहना उनके दर्द और संघर्ष को कम करके आंकने जैसा है। रोहिंग्या वे लोग हैं जो अत्याचार, हिंसा और जीवन के मूल अधिकार के खतरे के कारण अपना घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सिद्धांत भी यह स्पष्ट करते हैं कि पीड़ित की पहचान उसका दोष नहीं होती; बल्कि उसे सुरक्षा और सम्मान प्रदान करना सभ्य समाज की जिम्मेदारी है।
भारत का संवैधानिक दर्शन मानव जीवन की गरिमा को सर्वोच्च स्थान देता है। मैं उन प्रतिष्ठित व्यक्तियों की भावना से सहमत हूँ जिन्होंने कहा है कि न्याय, करुणा और समानता ही हमारी संविधानिक नैतिकता का आधार हैं। न्यायपालिका को हर कमजोर, पीड़ित और गैर-सुरक्षित व्यक्ति के अधिकारों का संरक्षक बनकर रहना चाहिए।
एक वैश्विक मानवाधिकार रक्षक के रूप में मेरी विनम्र अपील है कि न्यायपालिका की प्रत्येक टिप्पणी और दृष्टिकोण में संवेदनशीलता, संतुलन और मानव गरिमा का उच्चतम सम्मान झलके। भारत सदैव पीड़ा में पड़े मनुष्यों को आश्रय देने की परंपरा वाला राष्ट्र रहा है, और यही मानवीय दृष्टिकोण हमारे न्यायिक संवाद में भी प्रतिध्वनित होना चाहिए।
भारत की सर्वोच्च संस्थाओं से विश्व को संदेश जाना चाहिए कि हम हर पीड़ित की आवाज सुनते हैं और हर मानव के सम्मान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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